राष्ट्रवाद पर रविंद्र नाथ टैगोर की समालोचनात्मक टिपण्णी

राष्ट्रवाद हमारा अंतिम अध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता। मेरी शरण स्थली तो मानवता है। मैं हीरो की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जीवित हूं देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजई नहीं होने दूंगा।

रविंद्र नाथ टैगोर

रविंद्र नाथ टैगोर

रवींद्रनाथ टैगोर उपनिवेशिक शिक्षा संघ के कटु विरोधी थे और वह भारत की आजादी के पक्षधर थे वे चाहते थे कि उपनिवेश ओके ब्रितानी शासन में ‘मानवीय संबंधों की गरिमा बरकरार रखने’ की कोई गुंजाइश नहीं है। यह एक ऐसा विचार है जिसे पश्चिमी सभ्यता में भी उच्च स्थान प्राप्त है। रविंद्र नाथ टैगोर पश्चिमी साम्राज्यवाद का विरोध करने और पश्चिम सभ्यता को खारिज करने के बीच में फर्क चाहते थे। भारतीयों को अपनी संस्कृतिक विरासत में आस्था होनी चाहिए लेकिन उन्हें बाहरी दुनिया से खुले दिमाग से सीखने और उससे लाभ प्राप्त करने का विरोधी नहीं होना चाहिए।
रविंद्र नाथ टैगोर जिसे देशभक्ति कहते थे उसकी आलोचना उनके लेखन का विषय था विदेश के स्वाधीनता आंदोलन में मौजूद राष्ट्रवाद के आलोचक थे उन्हें भय था कि तथाकथित भारतीय परंपरा के पक्ष में पश्चिम को खारिज करने का विचार यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह अपने देश में मौजूद यहूदी पारसी इस्लाम और इस आई समेत तमाम विदेशी प्रभाव के खिलाफ आसानी से आक्रामक हो सकता है।

रविंद्र नाथ टैगोर
रविंद्र नाथ टैगोर

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